Tuesday, 26 August 2014

बचपन वाला घर



ढह गयी बचपन की वो इमारत
जिसमें लिखी थी मैंने जिंदगी की इबारत

वो मेरी आँखों में बसा घरौंदा है
शायद विकास की आंधी ने उसे रौंदा है

नहीं भूल पाउँगा मैं उन दीवारों को
उससे सटी गलियों और चौबारों को

उन लम्हों की तासीर अभी भी बहुत तेज़ है
लगता है मन में बैठा कोई रंगरेज़ है

नहीं देख पाउँगा अब मैं अपना वो पुराना घर
जिसमें बिताया मैंने जिंदगी का एक लम्बा सफ़र....

यादों सहित
अतुल जैन

गुरुजनों को समर्पित



गर्म पत्थर पे पानी डालता हूँ मैं
जीत कर भी हारता हूँ मैं
दुनिया को ना दिखे, ये नज़रों का फेर है
यूं तो हाथ की लकीरें काढता हूँ मैं

अतुल जैन

Friday, 22 August 2014

यूं ही हमको



जीवन की आपाधापी में
बिन तेल की बाती में
यूं ही हमको चलना होगा
यूं ही हमको जलना होगा

बिन सूरज की भोर में
रूढ़ियों की डोर में
यूं ही हमको उगना होगा
यूं ही हमको बंधना होगा

इन बेकाबू लहरों में
सन्नाटों के शहरों में
यूं ही हमको बहना होगा
यूं ही हमको रहना होगा

चौतरफा व्यापार में
दिखावे के बाज़ार में
यूं ही हमको ठगना होगा
यूं ही हमको सजना होगा

आभार... अतुल जैन