ढह गयी बचपन की वो इमारत
जिसमें लिखी थी मैंने जिंदगी
की इबारत
वो मेरी आँखों में बसा
घरौंदा है
शायद विकास की आंधी ने उसे
रौंदा है
नहीं भूल पाउँगा मैं उन
दीवारों को
उससे सटी गलियों और चौबारों
को
उन लम्हों की तासीर अभी भी
बहुत तेज़ है
लगता है मन में बैठा कोई
रंगरेज़ है
नहीं देख पाउँगा अब मैं अपना
वो पुराना घर
जिसमें बिताया मैंने जिंदगी
का एक लम्बा सफ़र....
यादों सहित
अतुल जैन
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