Tuesday, 26 August 2014

बचपन वाला घर



ढह गयी बचपन की वो इमारत
जिसमें लिखी थी मैंने जिंदगी की इबारत

वो मेरी आँखों में बसा घरौंदा है
शायद विकास की आंधी ने उसे रौंदा है

नहीं भूल पाउँगा मैं उन दीवारों को
उससे सटी गलियों और चौबारों को

उन लम्हों की तासीर अभी भी बहुत तेज़ है
लगता है मन में बैठा कोई रंगरेज़ है

नहीं देख पाउँगा अब मैं अपना वो पुराना घर
जिसमें बिताया मैंने जिंदगी का एक लम्बा सफ़र....

यादों सहित
अतुल जैन

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