Saturday, 20 June 2015

बेमिसाल घर

उन  दीवारों की दरारों के बीच
छत पर मेहनत के पसीने के सीलन थी
उसूलों का झड़ता सीमेंट था
ईमानदारी की खुरदुरी फर्श थी
सच का चरमराता दरवाज़ा था
तंगी से झूलता, आवाज़ करता पंखा था
ज़बान की जंग लगी अलमारी थी
इंसानियत के बोझ तले दबी, दो टूटी कुर्सियां थी
और फरेब से कभी न खुलने वाला बाहर का ताला था

हाँ, यही तो था, बरसों की कमाई से बनाया हुआ मेरे पिता का
बेमिसाल घर...

जो आज भी मेरे लिये

मंदिर है... 

आपका 
अतुल जैन

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