कुछ दिन पहले हुए इस हादसे ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर किया और मेरे अंदर इसके बारे में लिखने की असीम जिज्ञासा पैदा हुई। पता नही मैं अपनी संवेदनाओ को शब्दों में समेट पाऊंगा कि नहीं पर इतना यकीन है कि मेरे आँखों की नमी स्याही बन कर कागज पर उतरेगी ज़रुर ।
ये प्रदुम्न की मौत नहीं है। ये इंसानियत की मौत है, उस इंसानियत की, जिसकी कल्पना कर किसी रचयिता ने इस मानव सृष्टि को बनाया होगा ।
उस क्षण को सोच कांप उठता हूँ मैं, जब किसी ने प्रदुम्न को ज़ोर लगाकर अपनी तरफ खींचा होगा और प्रदुम्न अपनी आंखे भींच चिल्लाया होगा। जब उस शख्स ने प्रदुम्न की गर्दन पकड़ी होगी तो क्या एक बार भी उसको प्रदुम्न के मासूम चेहरे पर तरस आया होगा या फिर जब, उसने उसकी गर्दन पर छुरी रखी होगी तो क्यों नहीं उसको प्रदुम्न की आंखों का दर्द दिखा होगा। शायद उस ही पल मानवता ने कफ़न लपेटा होगा।
इसीलिए एक बार फिर मैं कहता हूँ ये सिर्फ प्रदुम्न की मौत नहीं है, ये हमारे अंदर की भावनाओं की मौत है।
सिसक रहीं हैं मेरी आँखें
आसुंओ से भर गया है दिल
एक बार फिर
इंसान ढूंढ़ने निकला हूँ मैं
अतुल जैन
ये प्रदुम्न की मौत नहीं है। ये इंसानियत की मौत है, उस इंसानियत की, जिसकी कल्पना कर किसी रचयिता ने इस मानव सृष्टि को बनाया होगा ।
उस क्षण को सोच कांप उठता हूँ मैं, जब किसी ने प्रदुम्न को ज़ोर लगाकर अपनी तरफ खींचा होगा और प्रदुम्न अपनी आंखे भींच चिल्लाया होगा। जब उस शख्स ने प्रदुम्न की गर्दन पकड़ी होगी तो क्या एक बार भी उसको प्रदुम्न के मासूम चेहरे पर तरस आया होगा या फिर जब, उसने उसकी गर्दन पर छुरी रखी होगी तो क्यों नहीं उसको प्रदुम्न की आंखों का दर्द दिखा होगा। शायद उस ही पल मानवता ने कफ़न लपेटा होगा।
इसीलिए एक बार फिर मैं कहता हूँ ये सिर्फ प्रदुम्न की मौत नहीं है, ये हमारे अंदर की भावनाओं की मौत है।
सिसक रहीं हैं मेरी आँखें
आसुंओ से भर गया है दिल
एक बार फिर
इंसान ढूंढ़ने निकला हूँ मैं
अतुल जैन