Sunday, 15 March 2015

मेरी दुविधा

रेत के महलों में
पत्थर गुमनाम है
झूठ के बाज़ार में
हकीकत नीलाम है

इमान के रेगिस्तान में
फ़रेब सरेआम है
मक्कारी के कोठे पे
शराफ़त बद्नाम है

तरक्की के खटोले पे
उड़ानों की कमान है
छोड़ा पीछे तुमने
महकता गुलफाम है

जस्बातों का क़त्ल कर
चेहरे पे मुस्कान है
दिखावे के इस मेले में
तू यूँ ही परेशान है

ज़िंदगी के दौड़ में
ये अजब फरमान है
दिल का दिमाग से
ये कैसा संग्राम है

आपका

अतुल जैन