Saturday, 20 June 2015

बेमिसाल घर

उन  दीवारों की दरारों के बीच
छत पर मेहनत के पसीने के सीलन थी
उसूलों का झड़ता सीमेंट था
ईमानदारी की खुरदुरी फर्श थी
सच का चरमराता दरवाज़ा था
तंगी से झूलता, आवाज़ करता पंखा था
ज़बान की जंग लगी अलमारी थी
इंसानियत के बोझ तले दबी, दो टूटी कुर्सियां थी
और फरेब से कभी न खुलने वाला बाहर का ताला था

हाँ, यही तो था, बरसों की कमाई से बनाया हुआ मेरे पिता का
बेमिसाल घर...

जो आज भी मेरे लिये

मंदिर है... 

आपका 
अतुल जैन

बेटी

माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही अपने पास बुलाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही खाना खिलाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही खिलौना दिलवाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही स्कूल में दाखिला दिलवाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही पूजा का तिलक लगाया

लेकिन माँ... मैं हमेशा तेरे साथ खडी थी
तेरी हर बात पे दीवार बनी अड़ी थी
अब भी मैं तेरे साथ हूँ .. तेरी आवाज़ हूँ

और सुन... जब भी तुझे मेरी जरूरत पड़ आएगी
सबसे पहले , तू मुझे अपने पास पायेगी.

साभार
अतुल जैन