उन दीवारों की दरारों के बीच
छत पर मेहनत के पसीने के
सीलन थी
उसूलों का झड़ता सीमेंट था
ईमानदारी की खुरदुरी फर्श
थी
सच का चरमराता दरवाज़ा था
तंगी से झूलता, आवाज़ करता
पंखा था
ज़बान की जंग लगी अलमारी थी
इंसानियत के बोझ तले दबी,
दो टूटी कुर्सियां थी
और फरेब से कभी न खुलने
वाला बाहर का ताला था
हाँ, यही तो था, बरसों की
कमाई से बनाया हुआ मेरे पिता का
बेमिसाल घर...
जो आज भी मेरे लिये
मंदिर है...
आपका
अतुल जैन