Sunday, 14 December 2014

ये दुनिया



ये दुनिया बहुत कमीनी है
इसने भूखे की रोटी छीनी है

मर कर भी आदमी जीता है
हर औरत यहाँ पर सीता है

किसी को किसी की खबर नहीं
किसी को यहाँ पर सबर नहीं

इमान यहाँ झुकता है
अरमान यहाँ लुटता है

मौत यहाँ बिकती है
सांस यहाँ रिसती है

कोख के लगती कीमत है
बेशर्मी बनती जीनत है

खून यहाँ पानी है
प्यार यहाँ बेमानी है

रावन का यहाँ राज है
सच की मरती आवाज है

मुश्किल यहाँ जीना है
छलनी यहाँ सीना है

अतुल जैन

खुद से मिलना एक बार है



ज़िन्दगी में यूं मशगूल हैं 
कि खुद से बहुत दूर हैं

खो गए खुद हम कुछ यूं रिश्तों में
कि बाँट दिया खुद को कुछ हिस्सों में

ये खुद से खुद का धोखा है
कि हर मोड़ पे खुद को रोका है

ये खुद की खुद से पुकार है
कि खुद से मिलना एक बार है

अतुल जैन

Sunday, 12 October 2014

उसकी आहटों का समंदर

बारिश की बूंदों ने
ऐसा भिगोया है
भूली हुई मोहब्बत को
यादों से पिरोया है

तन तो भीगा है
मन भी गीला है
उस चेहरे का भोलापन
मन में सजीला है

उन लम्हों की दीवानगी
फ़िर करवट ले रही है
उसकी शोख चंचलता
जैसे दस्तक दे रही है

वो नहीं है मेरे पास
मैं ये मानता हूँ
लेकिन वो जिंदा है मुझमें
सिर्फ इतना जानता हूँ

उसकी आहटों का समंदर
कई बांधों को तोड़ता है
उसके जाने का मंज़र
अभी भी आसुओं को जोड़ता है

आपका 
अतुल जैन

Saturday, 20 September 2014

जब खुद को ढूँढोगे, वो मिल जायेगा

हिम्मत कर के निकलो तो
वो रास्ते खुद दिखाता है

जी भर के उछलो तो
वो आकाश खुद सजाता है

प्यार से एक बार पुकारो तो
वो रिश्ते खुद बनाता है

दिल से एक बार निहारो तो
वो मोहब्बत खुद जगाता है

अपनी ग़लती मानो तो
वो आंसू खुद बन जाता है

अपनी शक्ति जानो तो
वो तुममें खुद जन जाता है

Saturday, 13 September 2014

अभिव्यक्ति

तू मेरा खून है, तू ही मेरा जूनून है
तू मेरा अरमान है, तू ही मेरी पहचान है
तू मेरा मान है, तू ही मेरी शान है
तू मेरा उद्देश्य है, तू ही मेरा परिप्रेक्ष्य है
तू मेरा अभिमान है, तू ही मेरा स्वाभिमान है
तू मेरा सहारा है, तू ही मेरा किनारा है
तू मेरी नज़र है, तू ही मेरी फ़िकर है
तू मेरा दर्पण है
“सब कुछ तुझ पर अर्पण है”

Tuesday, 26 August 2014

बचपन वाला घर



ढह गयी बचपन की वो इमारत
जिसमें लिखी थी मैंने जिंदगी की इबारत

वो मेरी आँखों में बसा घरौंदा है
शायद विकास की आंधी ने उसे रौंदा है

नहीं भूल पाउँगा मैं उन दीवारों को
उससे सटी गलियों और चौबारों को

उन लम्हों की तासीर अभी भी बहुत तेज़ है
लगता है मन में बैठा कोई रंगरेज़ है

नहीं देख पाउँगा अब मैं अपना वो पुराना घर
जिसमें बिताया मैंने जिंदगी का एक लम्बा सफ़र....

यादों सहित
अतुल जैन