बारिश की बूंदों ने
ऐसा भिगोया है
भूली हुई मोहब्बत को
यादों से पिरोया है
तन तो भीगा है
मन भी गीला है
उस चेहरे का भोलापन
मन में सजीला है
उन लम्हों की दीवानगी
फ़िर करवट ले रही है
उसकी शोख चंचलता
जैसे दस्तक दे रही है
वो नहीं है मेरे पास
मैं ये मानता हूँ
लेकिन वो जिंदा है मुझमें
सिर्फ इतना जानता हूँ
उसकी आहटों का समंदर
कई बांधों को तोड़ता है
उसके जाने का मंज़र
अभी भी आसुओं को जोड़ता है
आपका
अतुल जैन
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