Thursday, 31 December 2015

नया साल

रौनको का दौर चल रहा था
जश्नो का जाम चढ़ रहा था
नये साल की ख़ुशी में
हर शख्स झूम रहा था

वहीं दरवाज़े के उस पार
कुछ बच्चे टकटकी लगा रहे थे
ये शोर जल्द ख़त्म हो सोच रहे थे
ताकि कतार में वो हाथ बढ़ा सकें
बचे हुए खाने से भूख मिटा सकें

आभार
अतुल जैन  

Tuesday, 29 December 2015

टूटी इमारत

उनको हमारी ईमानदारी पे शक था
हमने तो वो भी ना माँगा जिस पर हमारा हक़ था
अब बहुत दूर दरिया में हम बह आये हैं
बोझिल मन और थकी आशायें हैं
आँखों की नमी देखो कुछ कहती है
इस टूटी इमारत में उसकी याद अभी भी रहती है

अतुल जैन 

दीवाली

मैंने उस दिन से दीवाली मनाना छोड़ दिया
जब मैंने दीवाली की उस काली और सर्द  रात
ढाई बजे उस छोटे से बच्चे को
जले और बुझे पटाखों में से
मसाला इक्कठा करते देखा
जिससे वो
अपने बचपन में
वो रोशनी भर सके
जो उसका पिता गरीबी की वज़ह से
उसको ना दे पाया.

सादर नमन
अतुल जैन