उनको हमारी ईमानदारी पे शक था
हमने तो वो भी ना माँगा जिस पर हमारा हक़ था
अब बहुत दूर दरिया में हम बह आये हैं
बोझिल मन और थकी आशायें हैं
आँखों की नमी देखो कुछ कहती है
इस टूटी इमारत में उसकी याद अभी भी रहती है
अतुल जैन
हमने तो वो भी ना माँगा जिस पर हमारा हक़ था
अब बहुत दूर दरिया में हम बह आये हैं
बोझिल मन और थकी आशायें हैं
आँखों की नमी देखो कुछ कहती है
इस टूटी इमारत में उसकी याद अभी भी रहती है
अतुल जैन
No comments:
Post a Comment