Wednesday, 29 June 2016

अमन और दोस्ती

अब तो अश्क भी जवाब माँगते हैं
उनके लिये क्यों रोंये; जो हिसाब माँगते हैं
जिंदगी भर जो रहे खुद में मशगूल
वो हमसे वफा की किताब माँगते हैं

जो रहे ताउम्र हमारे; इन्कलाब माँगते हैं
अपने लिये नया आफ़ताब माँगते हैं
घाटी इस कदर खौफज़दा है दोस्तों
कि जुगनू भी अब नकाब माँगते हैं

नफ़रत के दौर में अमन सैलाब माँगते हैं
जन्नती दुनिया का ख्वाब माँगते हैं
दीवाली की रौशनी में चलो इस बार
हम ईदी और अदब ए आदाब माँगते हैं

दौड़ती जिंदगी में सुकून बेताब माँगते हैं
फ़ीके रिश्तों में रंग सुर्खाब माँगते हैं
चलो उस रूठे शख्स से आज हम
दोस्ती का एक बार गुलाब माँगते हैं

आभार सहित
अतुल जैन

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