Wednesday, 27 June 2018

बुजुर्ग

आँसुओं से चरण भिगा दो
सबसे बड़ा अभिषेक वही है

थोड़ी देर साथ बैठ लो
सबसे बड़ा ध्यान वही है

उदास मन को जगा दो
सबसे बड़ी गुरु सेवा वही है

सोते हुए ओढ़नी उढा दो
सबसे बड़ी चादर वही है

प्यार से माथा सहला दो
सबसे बड़ा पालना वही है

इस रिश्ते को ना भूलो कभी
सबसे बड़ी आराधना वही है

अतुल जैन


Friday, 22 June 2018

रसूख

ये रसूख भी बहुत बड़ी चीज है
अच्छे अच्छों की गर्दन झुकवा देती है
बड़ा स्वागत होता है,
माला पहनायी जाती है,
मोमेंटम भेंट होता है
कुछ शब्द भी बोलने को कहा जाता है
दो लोग लेने और चार लोग छोड़ने जाते हैं

समाज में रसूख की कीमत होती है
"ईमान" के रसूख की कोई कीमत नहीं होती !!!

सविनय,
अतुल जैन

Wednesday, 6 June 2018

बिकता नहीं हूं

बस्तियों में ताली बजवाने के लिए नहीं लिखता
समारोहों में धूम जमवाने के लिए नहीं लिखता
मन की स्थिति जताने के लिए लिखता हूँ
शायद इसीलिये बाज़ारों में नहीं बिकता हूँ

साभार
अतुल जैन






सिमटता बचपन

उनको बचपन की सौगात दे दो
नन्हे हाथों में अपना हाथ दे दो
दौड़ लो कुछ दूर उनके साथ नंगे पैर
फिर मुड़कर प्यार से आवाज़ दे दो

खिलखिलायेंगे वो मिट्टी के घरौंदे बना के
रूठ जाएंगे हाथों को चेहरे पे लगा के
बालों को सहला के जस्बात दे दो
चंदा मामा वाली उनको एक रात दे दो

अपनी व्यस्तता को कुछ आराम दे दो
बैठो उनके साथ और एक पहचान दे दो
बहुत ख्वाईशें हैं छोटे से दिल में उनके
पंख लगाकर एक ऊंची उड़ान दे दो

साभार
अतुल जैन

Saturday, 16 September 2017

प्रदुम्न की मौत

कुछ दिन पहले हुए इस हादसे ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर किया और मेरे अंदर इसके बारे में लिखने की असीम जिज्ञासा पैदा हुई। पता नही मैं अपनी संवेदनाओ को शब्दों में समेट पाऊंगा कि नहीं पर इतना यकीन है कि मेरे आँखों की नमी स्याही बन कर कागज पर उतरेगी ज़रुर ।

ये प्रदुम्न की मौत नहीं है। ये इंसानियत की मौत है, उस इंसानियत की, जिसकी कल्पना कर किसी रचयिता ने इस मानव सृष्टि को बनाया होगा ।

उस क्षण को सोच कांप उठता हूँ मैं, जब किसी ने प्रदुम्न को ज़ोर लगाकर अपनी तरफ खींचा होगा और प्रदुम्न अपनी आंखे भींच चिल्लाया होगा। जब उस शख्स ने प्रदुम्न की गर्दन पकड़ी होगी तो क्या एक बार भी उसको प्रदुम्न के मासूम चेहरे पर तरस आया होगा या फिर जब, उसने उसकी गर्दन पर छुरी रखी होगी तो क्यों नहीं उसको प्रदुम्न की आंखों का दर्द दिखा होगा। शायद उस ही पल मानवता ने कफ़न लपेटा होगा।

इसीलिए एक बार फिर मैं कहता हूँ ये सिर्फ प्रदुम्न की मौत नहीं है, ये हमारे अंदर की भावनाओं की मौत है।

सिसक रहीं हैं मेरी आँखें
आसुंओ से भर गया है दिल
एक बार फिर
इंसान ढूंढ़ने निकला हूँ मैं 

अतुल जैन