Saturday, 26 July 2014

किसे कहते हैं बिटिया

घर आने पर दौड़ कर जो पास आये, उसे कहते हैं बिटिया
थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए, उसे कहते हैं बिटिया
"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये, उसे कहते हैं बिटिया
हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये, उसे कहते हैं बिटिया
घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं बिटिया
सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये, उसे कहते हैं बिटिया
दूर जाने पर जो बहुत रुलाये, उसे कहते हैं बिटिया
पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये, उसे कहते हैं बिटिया
मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये, उसे कहते हैं बिटिया
"अनमोल हीरा" जो इसीलिए कहलाये, उसे कहते हैं बिटिया

अतुल जैन

वो नहीं है............



भोर में वो चमक नहीं है
चेहरे पे वो दमक नहीं है
रोटी में वो नमक नहीं है
जूनून में वो सनक नहीं है

उल्फत में वो सैलाब नहीं है
इज्ज़त में वो आदाब नहीं है
शर्म में वो नकाब नहीं है
जंग में वो रक़ाब नहीं है

पेड़ में वो छांव नहीं है
घुंघरू में वो पांव नहीं है
खेल में वो दांव नहीं है
लहरों में वो नाव नहीं है

शाम में वो मंज़र नहीं है
भक्ति में वो खंजर नहीं है
सीने में वो पंजर नहीं है
जंगल में वो संजर नहीं है

प्रेमी में वो प्रीत नहीं है
रिश्तों में वो रीत नहीं है
सुर में वो संगीत नहीं है
स्वर में वो गीत नहीं है

जस्बातों में वो एहसास नहीं है
वचनों में वो वनवास नहीं है
सपनों में वो आस नहीं है
दस्तक में वो आभास नहीं है

ममता में वो भाव नहीं है
सोच में वो फैलाव नहीं है
चरित्र में वो ठहराव नहीं है
बातों में वो चाव नहीं है

ढाढस में वो पीर नहीं है
आँखों में वो नीर नहीं है
परसी में वो खीर नहीं है
बोली में वो धीर नहीं है

अतुल जैन

जीतेंगे आसमान


छिटकेगी दूर निराशा
विजय की लिखेंगे परिभाषा

नयन ने फ़िर बाटी ज़ोह
छूटा न चमन से मेरा म़ोह

चूर करेंगे सघन आक्रोश
लिखेंगे एक नया उद्घोष...

अतुल जैन

मत छेड़ो



मत छेड़ो इस पीड़ा को
समय की इस क्रीड़ा को

तम और घनघोर हुआ
कौतूहल सा शोर हुआ

घटा और बेचैन हुई
बहुत लम्बी रैन हुई

अश्रुओं की धारा बही
चित में ना आस रही

पंछियों ने छोड़ा बसेरा
आहतों ने सहसा घेरा

मत छेड़ो इस पीड़ा को
समय की इस क्रीड़ा को

अतुल जैन

Friday, 11 July 2014

क्यूँ याद आती है मुझे.............

इस रैपिड मेट्रो के ज़माने में

क्यूँ याद आती है मुझे अपनी दो पहिये वाली बड़ी सी साईकिल, जिसको हम बीच से कैंची कहकर चलाते थे और हर रोज़ पानी से धोकर चमकाते थे

इस रोबोट वाले खिलौने की खुशी में

क्यूँ नहीं भूल पाता हूँ मैं, जूट की बनी वो अपनी छोटी सी गुड़िया, जिसको मैं खूब संजो के रखता और उसका एक भी रेशा निकलने पर उसको, उसमें ही लगा देता.

इस रेन डांस वाली दुनिया में

क्यूँ मुझे अपने घर के पीछे वाला वो आँगन याद आता है, जब हम बारिश में, खुले हाथ से बूंदों को समेटते और बूंदें हमारे चेहरे से टकराएँ इसलिए अपना मुहँ आसमान की तरफ़ करते.

इस एम्यूजमेंट पार्क की चौंध में

क्यूँ गुद्गुदाती है मुझे लकड़ी के फट्टे वाली वो देसी कार, जिस पर हमने चारों तरफ़ बौल बिअरिंग के पहिये लगाये थे और उस पर बैठ कर पड़ोस तक घूम कर आये थे.

इस भूरी चोकलेट की मिठास में

क्यूँ याद आती है मुझे वो लड्डुओं की गीली ख़ुशबू जो ऊपर रखे कटोरदान से नानी हमारे लिए निकाला करतीं थीं और उसमें मिली किशमिश को हमेशा अलग से निकालकर खिलाया करतीं थीं.

इस सोशल नेटवर्किंग की साइट्स में

क्यूँ हमें याद आती है वो गर्मी की छुट्टियाँ, जब हम पड़ोस में दोस्त के घर दोपहर को कमरे में अंधेरा कर, छुपन-छुपाई खेलने जाते थे और आंटी का बनाया हुआ रूह अफज़ा का शर्बत पी कर ही वापस आते थे.


इस सेंट्रली ऐसी की ठंडक में

अभी भी याद आती है वो शाम, जब बारिश में दरवाज़े के पास कुर्सियाँ जोड़कर बिछाई जातीं थीं और वो हवा के साथ ठंडी छींटे हमको भियोगा करती थीं.

इस एरो प्लेन की उड़ान में 

क्यूँ रह जाती मन में उस झूले की याद, जो हमारे पड़ोस में लगा था. उस पर हम खूब दम लगाकर झूला करते थे और हर उठान के साथ आसमान को पकड़ने की कोशिश करते थे


इस बड़ी सी कार की रफ़्तार में

क्यूँ रह गयी है याद मुझको दादू के कंधे की वो सवारी, जिस पर बैठ कर मेले में हम चारों तरफ़ घूमते और अनगिनत नज़ारों को ढूँढ़ते.

इस वीडियो, डीवीडी के दौर में

अभी भी याद है मुझे दशहरे की वो रातें, जब हम शाम से ही रौशनी और झांकिया देखने दोस्तों की टोली बनाकर निकल जाया करते थे और सुबह भोर में ही वापस आया करते थे.

इस एमटीवी, रैप म्यूजिक के चैनलों के बीच

रह जाती है याद मुझको उस बुधवार के चित्रहार की, जिसका हम हफ्तेभर से करते थे इंतज़ार और शुरू होने के पंद्रह मिनट पहले ही से लाइन बनाकर टीवी के सामने बैठ जाया करते थे हर बार.

ये वो यादें हैं जो दिल में ऐसी समाईं हैं जो छूट नहीं पातीं हैं या कहो छूट नहीं सकतीं. रास्ते तो बढते चले जाते हैं पर पाँव अपने निशान जरूर छोड़ जातें हैं.

यादों सहित,
अतुल जैन

सिमटते हम

सिमटती दुनिया,
सिमटते सपने,
सिमटता मन
और
सिमटते हम

अतुल जैन

Monday, 7 July 2014

भगवान् मुझे कमज़ोर ही रखना...

भगवान् मुझे इतनी ऊँचाई न देना कि मैं वहां से ज़मीन को न देख पाऊं
मुझे इतनी ताकत न देना कि मैं दर्द के मर्म को ही भूल जाऊँ

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना जिससे मैं महसूस कर सकूं कि ये जीवन दिल की धड़कनो पर आश्रित है और ये सासें एक अदृश्य शक्ति की अमानत हैं

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं सुबह उठूं तो अपने परिवार के लोगों का चेहरा न देख पाने पर परेशां हो जाऊँ और उनका साथ ही मुझे संबल दे

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं अपने माता पिता के चरणों को स्पर्श करूँ तो स्वतः ही ऑंखें झुक कर उनको प्रणाम करें और उनके दिए जीवन पर उनका आभार प्रकट करें

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं अपनी संगिनी के साथ चलूँ तो उसके पीछे छूट जाने का डर हमेशा मेरे साथ रहे और मेरी निगाहें हमेशा उसको ढूँढती रहें

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मेरे बच्चे किसी बागीचे मे खेल रहें हों और एक छोटे से झूले पर हिलते हुए ज़ोर से खिलखिलाएं तो मेरी भी ऑंखें उनकी इस खुशी पर स्वतः ही झूम जाएँ और नम हो जाएँ

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब सड़क पर चलते हुए अगर मैं किसी के पुकारने की आवाज़ सुनूं तो रुक जाऊँ और उसके पास जाकर उससे पूछूं कि उसे किस बात का दर्द है

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं किसी नारी पर अत्याचार की खबर सुनूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाएँ और इस रोग से लड़ने का ज़ज्बा मैं अपने आप में पैदा कर सकूं

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब सड़क पर किसी लाल बत्ती पर बिलखते हुए बच्चे की आवाज़ सुनूं तो उसकी तरफ देखूं और एक सार्थक सहायता से उसको चुप कराने का प्रयास कर सकूं

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं किसी राह से गुजरूँ और रास्ते में एक बिन कपडे के पड़े हुए इंसान को पाऊं तो बढ़ ना जाऊँ बल्कि कोई चादर से उसके जख्म को ढक सकूं

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं आइसक्रीम के ठेले पर अर्ध नग्न बच्चों को ललचाई आँखों से निहारता हुआ देखूं तो थम जाऊँ और उन्हें भी यह सर्द खुशी बाँट सकूं

मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... आगे बढ़ने के जोश में मैं अपनों से इतना दूर न हो जाऊँ कि चाह कर भी उनसे बात ना कर पाऊं  या फिर... उठने की चाह में मैं किसी की भी अहमियत को रौंदता चला जाऊँ और अपने आप को दंभ की दीवारों में कैद कर लूं

भगवान मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं चाहूं खुद से बात कर सकूं और आखों के बंद होने पर ये तसल्ली हो कि मैं अपनी मिट्टी का क़र्ज़ निभा पाया हूँ, जिस भेस में आया था उसी ही भेस में जा पाया हूँ !

आभार सहित,
अतुल जैन

जब मिल बैठेंगे पुराने दोस्त

एक रोज़ बैठेंगे मिल के
जाम पियेंगे दिल के
महफ़िल सजेगी यादों की
आसमानी इरादों की
वादों की लगायेंगे झड़ी
ठहाकों की भी होगी लड़ी
गायेंगे बिसरे गीत
छेड़ेंगे पुरानी प्रीत
मस्त होगा ये दौर
इंतज़ार न करो और
एक रोज़ बैठेंगे मिल के
जाम पियेंगे दिल के

अतुल जैन

आग्रह

हमारे बीच के विश्वास को
चलो कुछ इनाम दें
अब इस रिश्ते को
हम एक नाम दें

अतुल जैन