Friday, 11 July 2014

क्यूँ याद आती है मुझे.............

इस रैपिड मेट्रो के ज़माने में

क्यूँ याद आती है मुझे अपनी दो पहिये वाली बड़ी सी साईकिल, जिसको हम बीच से कैंची कहकर चलाते थे और हर रोज़ पानी से धोकर चमकाते थे

इस रोबोट वाले खिलौने की खुशी में

क्यूँ नहीं भूल पाता हूँ मैं, जूट की बनी वो अपनी छोटी सी गुड़िया, जिसको मैं खूब संजो के रखता और उसका एक भी रेशा निकलने पर उसको, उसमें ही लगा देता.

इस रेन डांस वाली दुनिया में

क्यूँ मुझे अपने घर के पीछे वाला वो आँगन याद आता है, जब हम बारिश में, खुले हाथ से बूंदों को समेटते और बूंदें हमारे चेहरे से टकराएँ इसलिए अपना मुहँ आसमान की तरफ़ करते.

इस एम्यूजमेंट पार्क की चौंध में

क्यूँ गुद्गुदाती है मुझे लकड़ी के फट्टे वाली वो देसी कार, जिस पर हमने चारों तरफ़ बौल बिअरिंग के पहिये लगाये थे और उस पर बैठ कर पड़ोस तक घूम कर आये थे.

इस भूरी चोकलेट की मिठास में

क्यूँ याद आती है मुझे वो लड्डुओं की गीली ख़ुशबू जो ऊपर रखे कटोरदान से नानी हमारे लिए निकाला करतीं थीं और उसमें मिली किशमिश को हमेशा अलग से निकालकर खिलाया करतीं थीं.

इस सोशल नेटवर्किंग की साइट्स में

क्यूँ हमें याद आती है वो गर्मी की छुट्टियाँ, जब हम पड़ोस में दोस्त के घर दोपहर को कमरे में अंधेरा कर, छुपन-छुपाई खेलने जाते थे और आंटी का बनाया हुआ रूह अफज़ा का शर्बत पी कर ही वापस आते थे.


इस सेंट्रली ऐसी की ठंडक में

अभी भी याद आती है वो शाम, जब बारिश में दरवाज़े के पास कुर्सियाँ जोड़कर बिछाई जातीं थीं और वो हवा के साथ ठंडी छींटे हमको भियोगा करती थीं.

इस एरो प्लेन की उड़ान में 

क्यूँ रह जाती मन में उस झूले की याद, जो हमारे पड़ोस में लगा था. उस पर हम खूब दम लगाकर झूला करते थे और हर उठान के साथ आसमान को पकड़ने की कोशिश करते थे


इस बड़ी सी कार की रफ़्तार में

क्यूँ रह गयी है याद मुझको दादू के कंधे की वो सवारी, जिस पर बैठ कर मेले में हम चारों तरफ़ घूमते और अनगिनत नज़ारों को ढूँढ़ते.

इस वीडियो, डीवीडी के दौर में

अभी भी याद है मुझे दशहरे की वो रातें, जब हम शाम से ही रौशनी और झांकिया देखने दोस्तों की टोली बनाकर निकल जाया करते थे और सुबह भोर में ही वापस आया करते थे.

इस एमटीवी, रैप म्यूजिक के चैनलों के बीच

रह जाती है याद मुझको उस बुधवार के चित्रहार की, जिसका हम हफ्तेभर से करते थे इंतज़ार और शुरू होने के पंद्रह मिनट पहले ही से लाइन बनाकर टीवी के सामने बैठ जाया करते थे हर बार.

ये वो यादें हैं जो दिल में ऐसी समाईं हैं जो छूट नहीं पातीं हैं या कहो छूट नहीं सकतीं. रास्ते तो बढते चले जाते हैं पर पाँव अपने निशान जरूर छोड़ जातें हैं.

यादों सहित,
अतुल जैन

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