भगवान् मुझे इतनी ऊँचाई न देना कि मैं वहां से ज़मीन को न देख पाऊं
मुझे इतनी ताकत न देना कि मैं दर्द के मर्म को ही भूल जाऊँ
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना जिससे मैं महसूस कर सकूं कि ये जीवन दिल की धड़कनो पर आश्रित है और ये सासें एक अदृश्य शक्ति की अमानत हैं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं सुबह उठूं तो अपने परिवार के लोगों का चेहरा न देख पाने पर परेशां हो जाऊँ और उनका साथ ही मुझे संबल दे
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं अपने माता पिता के चरणों को स्पर्श करूँ तो स्वतः ही ऑंखें झुक कर उनको प्रणाम करें और उनके दिए जीवन पर उनका आभार प्रकट करें
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं अपनी संगिनी के साथ चलूँ तो उसके पीछे छूट जाने का डर हमेशा मेरे साथ रहे और मेरी निगाहें हमेशा उसको ढूँढती रहें
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मेरे बच्चे किसी बागीचे मे खेल रहें हों और एक छोटे से झूले पर हिलते हुए ज़ोर से खिलखिलाएं तो मेरी भी ऑंखें उनकी इस खुशी पर स्वतः ही झूम जाएँ और नम हो जाएँ
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब सड़क पर चलते हुए अगर मैं किसी के पुकारने की आवाज़ सुनूं तो रुक जाऊँ और उसके पास जाकर उससे पूछूं कि उसे किस बात का दर्द है
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं किसी नारी पर अत्याचार की खबर सुनूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाएँ और इस रोग से लड़ने का ज़ज्बा मैं अपने आप में पैदा कर सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब सड़क पर किसी लाल बत्ती पर बिलखते हुए बच्चे की आवाज़ सुनूं तो उसकी तरफ देखूं और एक सार्थक सहायता से उसको चुप कराने का प्रयास कर सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं किसी राह से गुजरूँ और रास्ते में एक बिन कपडे के पड़े हुए इंसान को पाऊं तो बढ़ ना जाऊँ बल्कि कोई चादर से उसके जख्म को ढक सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं आइसक्रीम के ठेले पर अर्ध नग्न बच्चों को ललचाई आँखों से निहारता हुआ देखूं तो थम जाऊँ और उन्हें भी यह सर्द खुशी बाँट सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... आगे बढ़ने के जोश में मैं अपनों से इतना दूर न हो जाऊँ कि चाह कर भी उनसे बात ना कर पाऊं या फिर... उठने की चाह में मैं किसी की भी अहमियत को रौंदता चला जाऊँ और अपने आप को दंभ की दीवारों में कैद कर लूं
भगवान मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं चाहूं खुद से बात कर सकूं और आखों के बंद होने पर ये तसल्ली हो कि मैं अपनी मिट्टी का क़र्ज़ निभा पाया हूँ, जिस भेस में आया था उसी ही भेस में जा पाया हूँ !
आभार सहित,
अतुल जैन
मुझे इतनी ताकत न देना कि मैं दर्द के मर्म को ही भूल जाऊँ
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना जिससे मैं महसूस कर सकूं कि ये जीवन दिल की धड़कनो पर आश्रित है और ये सासें एक अदृश्य शक्ति की अमानत हैं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं सुबह उठूं तो अपने परिवार के लोगों का चेहरा न देख पाने पर परेशां हो जाऊँ और उनका साथ ही मुझे संबल दे
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं अपने माता पिता के चरणों को स्पर्श करूँ तो स्वतः ही ऑंखें झुक कर उनको प्रणाम करें और उनके दिए जीवन पर उनका आभार प्रकट करें
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं अपनी संगिनी के साथ चलूँ तो उसके पीछे छूट जाने का डर हमेशा मेरे साथ रहे और मेरी निगाहें हमेशा उसको ढूँढती रहें
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मेरे बच्चे किसी बागीचे मे खेल रहें हों और एक छोटे से झूले पर हिलते हुए ज़ोर से खिलखिलाएं तो मेरी भी ऑंखें उनकी इस खुशी पर स्वतः ही झूम जाएँ और नम हो जाएँ
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब सड़क पर चलते हुए अगर मैं किसी के पुकारने की आवाज़ सुनूं तो रुक जाऊँ और उसके पास जाकर उससे पूछूं कि उसे किस बात का दर्द है
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं किसी नारी पर अत्याचार की खबर सुनूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाएँ और इस रोग से लड़ने का ज़ज्बा मैं अपने आप में पैदा कर सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब सड़क पर किसी लाल बत्ती पर बिलखते हुए बच्चे की आवाज़ सुनूं तो उसकी तरफ देखूं और एक सार्थक सहायता से उसको चुप कराने का प्रयास कर सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं किसी राह से गुजरूँ और रास्ते में एक बिन कपडे के पड़े हुए इंसान को पाऊं तो बढ़ ना जाऊँ बल्कि कोई चादर से उसके जख्म को ढक सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं आइसक्रीम के ठेले पर अर्ध नग्न बच्चों को ललचाई आँखों से निहारता हुआ देखूं तो थम जाऊँ और उन्हें भी यह सर्द खुशी बाँट सकूं
मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... आगे बढ़ने के जोश में मैं अपनों से इतना दूर न हो जाऊँ कि चाह कर भी उनसे बात ना कर पाऊं या फिर... उठने की चाह में मैं किसी की भी अहमियत को रौंदता चला जाऊँ और अपने आप को दंभ की दीवारों में कैद कर लूं
भगवान मुझे तो तुम कमज़ोर ही रखना कि... जब मैं चाहूं खुद से बात कर सकूं और आखों के बंद होने पर ये तसल्ली हो कि मैं अपनी मिट्टी का क़र्ज़ निभा पाया हूँ, जिस भेस में आया था उसी ही भेस में जा पाया हूँ !
आभार सहित,
अतुल जैन
No comments:
Post a Comment