Thursday, 31 December 2015

नया साल

रौनको का दौर चल रहा था
जश्नो का जाम चढ़ रहा था
नये साल की ख़ुशी में
हर शख्स झूम रहा था

वहीं दरवाज़े के उस पार
कुछ बच्चे टकटकी लगा रहे थे
ये शोर जल्द ख़त्म हो सोच रहे थे
ताकि कतार में वो हाथ बढ़ा सकें
बचे हुए खाने से भूख मिटा सकें

आभार
अतुल जैन  

Tuesday, 29 December 2015

टूटी इमारत

उनको हमारी ईमानदारी पे शक था
हमने तो वो भी ना माँगा जिस पर हमारा हक़ था
अब बहुत दूर दरिया में हम बह आये हैं
बोझिल मन और थकी आशायें हैं
आँखों की नमी देखो कुछ कहती है
इस टूटी इमारत में उसकी याद अभी भी रहती है

अतुल जैन 

दीवाली

मैंने उस दिन से दीवाली मनाना छोड़ दिया
जब मैंने दीवाली की उस काली और सर्द  रात
ढाई बजे उस छोटे से बच्चे को
जले और बुझे पटाखों में से
मसाला इक्कठा करते देखा
जिससे वो
अपने बचपन में
वो रोशनी भर सके
जो उसका पिता गरीबी की वज़ह से
उसको ना दे पाया.

सादर नमन
अतुल जैन 

Saturday, 19 September 2015

विश्वास

हमने हथेली पे लकीरों को बनते देखा है
पत्थर में भगवान् को उतरते देखा है
तुम मानो या ना मानो... तुम्हारी मर्जी

हमने हाथ से किस्मत को सरकते देखा है

आपका 
अतुल जैन

अज़ब की बात

वो सितारों में मशगूल थे
दरअसल आखों की धूल थे

जो हमारे उसूल थे
उनको वो फ़िज़ूल थे

किसी के हिस्से तारे थे
किसी के हिस्से रात थी....

ये अज़ब की बात थी !!!

Saturday, 20 June 2015

बेमिसाल घर

उन  दीवारों की दरारों के बीच
छत पर मेहनत के पसीने के सीलन थी
उसूलों का झड़ता सीमेंट था
ईमानदारी की खुरदुरी फर्श थी
सच का चरमराता दरवाज़ा था
तंगी से झूलता, आवाज़ करता पंखा था
ज़बान की जंग लगी अलमारी थी
इंसानियत के बोझ तले दबी, दो टूटी कुर्सियां थी
और फरेब से कभी न खुलने वाला बाहर का ताला था

हाँ, यही तो था, बरसों की कमाई से बनाया हुआ मेरे पिता का
बेमिसाल घर...

जो आज भी मेरे लिये

मंदिर है... 

आपका 
अतुल जैन

बेटी

माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही अपने पास बुलाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही खाना खिलाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही खिलौना दिलवाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही स्कूल में दाखिला दिलवाया
माँ हमेशा तूने मुझे बाद में ही पूजा का तिलक लगाया

लेकिन माँ... मैं हमेशा तेरे साथ खडी थी
तेरी हर बात पे दीवार बनी अड़ी थी
अब भी मैं तेरे साथ हूँ .. तेरी आवाज़ हूँ

और सुन... जब भी तुझे मेरी जरूरत पड़ आएगी
सबसे पहले , तू मुझे अपने पास पायेगी.

साभार
अतुल जैन

Saturday, 23 May 2015

हमसफ़र

जिंदगी ने मुझे बहुत बड़ा तोहफ़ा दिया है
वो ये... कि तुमने मुझे बिना किसी चाह के प्यार किया है

कई बार तुमने दफ़न किया मेरी हंसी के लिए अपने अस्तित्व को
बहुत खूबी से बदल डाला मेरी ख़ुशी के लिए अपने व्यक्तित्व को

मुझे पता है तुम्हारे प्यार का रंग खून से भी गहरा है
तुम्हारी हर सांस – हर बात में मेरा ही चेहरा है

तुमने अपने लिए मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा
फ़िर भी.. अपना हर कुछ कर दिया मुझसे साँझा

ये मेरे लिए साधारण बात नहीं है
ये मेरे कोई क्षणिक जस्बात नहीं है

तुम्हारा ये बेपरवाह समर्पण मेरे लिए अमूल्य है
सच कहूं... तुमसे सजा जिंदगी का ये दर्पण अतुल्य है

साभार... अतुल जैन

तुम

तुम्हारी आँखों के पानी को
कभी ढलने नहीं दूंगा
मेरे प्रति तुम्हारे विश्वास को
कभी पिघलने नहीं दूंगा

इस साथ को रब यूं ही बनाये रखना
क्यूंकि मैं

तुम्हारे वज़ूद को अपने दिल से
कभी निकलने नहीं दूंगा

अतुल जैन

Sunday, 15 March 2015

मेरी दुविधा

रेत के महलों में
पत्थर गुमनाम है
झूठ के बाज़ार में
हकीकत नीलाम है

इमान के रेगिस्तान में
फ़रेब सरेआम है
मक्कारी के कोठे पे
शराफ़त बद्नाम है

तरक्की के खटोले पे
उड़ानों की कमान है
छोड़ा पीछे तुमने
महकता गुलफाम है

जस्बातों का क़त्ल कर
चेहरे पे मुस्कान है
दिखावे के इस मेले में
तू यूँ ही परेशान है

ज़िंदगी के दौड़ में
ये अजब फरमान है
दिल का दिमाग से
ये कैसा संग्राम है

आपका

अतुल जैन

Saturday, 24 January 2015

कौन पालनहार

प्रहरी करे प्रहार
ये कैसा व्यवहार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

शब्दों का व्यापार
पीठ पे हो वार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

ताकत का सत्कार
इमान की हो हार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

प्रकृति खोये आधार
मशीनो का अम्बार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

सपने हुए लाचार
हकीकत की तलवार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

बचपन मांगे प्यार
खुशी ली उधार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

ज़िन्दगी दिन चार
मौत खड़ी उस पार
इस बेदिल दुनिया में
कौन पालनहार

सादर नमन्
अतुल जैन

इमान की गिरफ्त में

ओहदों को हमने चुना नहीं
प्यादों को हमने चला नहीं
इमान की गिरफ्त में हम कुछ यूं रहे
कि गैरों को भी हमने ठगा नहीं

साभार
अतुल जैन