Friday, 27 June 2014

मोक्ष की अभिलाषा

यह कविता मुझे अत्यंत प्रिय है और मैं इसे अपने सभी प्रियजनों को समर्पित करता हूँ...

अंत का अंत कर दो
जीवन अमर कर दो
इस माया नग़री का
मूल नश्वर कर दो

परम शक्ति की तृष्णा को
हृदय से आलिंगन कर लो
उस विलक्षण तेज़ में
पूर्णतः समर्पण कर दो

इस काया, करनी को
अंततः विश्राम दो
जो मिला इस नग़री से
इसको ही अर्पण कर दो

जीवन की लेखनीं को
अब पूर्ण विराम दो
नहीं लौटना इस प्रांगण में
सृष्टि से ये प्रण कर लो!

आभार सहित,
अतुल जैन

नई शुरुआत - नया विश्वास

आसमान से लायेंगे रौशनी के सितारे
अँधेरे भी देखेंगे ये हुनर हमारे
बहुत हुए ये बेदर्द नज़ारे
अब तीर निकलेंगे तरकश से हमारे...

अतुल जैन

तुम, मैं और हम....

ये अकस्मात् क्षण,
और तुम्हारा साथ,

कहता है सिर्फ् एक बात,

तुम भी वही हो,
मैं भी वही हूँ,

बस "हम" वो नहीं हैं!

शुभ समय,
अतुल जैन

Sunday, 22 June 2014

तुम्हारा साथ

आओ कुछ दूर एक साथ चलें
तुम कुछ न कहो और हम न कुछ बात करें, एक शाख पर बैठें और सिर्फ मुलाकात करें

किसी रोज़ सुबह यु ही खिलखिलाएं किसी बात पर और खुले आसमान में कुछ बुने
कभी मिटटी की सोंधी गंध सूंघे और पेड़ के नीचे बिखरे हुए फूल चुने

फिर कोई छोटी सी शर्त लगाकर बहुत दूर तक दौड़ लगायें और हाँफते हुए थक कर बैठ जाएँ
एक शाम जोरदार बारिश मे नहायें और पत्तिओं की कश्ती बनाकर पानी मे तैराएँ

चलो एक दिन नदी किनारे हाथ मे हाथ लिए हम दोनों एक साथ कोई पुराना गीत गुनगुनाएं
फिर अचानक ही हम पीछे से आयें और कान मे तुम्हारे कुछ बुदबुदाएं

फिर एक बार गर्मी की रात मे हम छत पर लेटें और खुले आकाश मे दूर तक सितारे गिने
और भगवान से ये दुआ करें कि ये पल जो हमारा है, वो हमसे कभी ना छिने

आओ कुछ दूर एक साथ चलें

अतुल जैन

Thursday, 19 June 2014

ना बदल पाने का दर्द

फसानो का जमाना है
यही तो नहीं हमने जाना है
क्या करे हम भी
ज़ज्बाती दिल से रिश्ता पुराना है

आपका
अतुल जैन

कुछ नया करने की चाह

बना हुआ है एक रास्ता पहले से
लोगों का कारवां भी है, मैं देख रहा हूँ
कोई बहुत सफल है तो कोई निराश
लेकिन रास्ता वही एक है, मंजिल भी एक

चाहता हूँ मैं चलूँ एक नए रास्ते पर
बनाऊ एक नयी मंजिल, एक नया कारवां
लेकिन डर है कि कहीं यह रास्ता गलत न हो
डर है कहीं मैं भटक ना जाऊं
या फिर रास्ता ही मेरा साथ न छोड़ दे....

अतुल जैन

अंतर द्वन्द

नदी के नीचे भी एक नदी बहती है

पत्थर से टकरा टकरा कर
अकस्मात् नीचे की ओर
उतर आती है नदी

किनारे से हिलकोरे लेती हुई
फैलने की चाह मे कभी कभी
किनारे से लड़ती है नदी
मगर किनारा कहता है

मत फैल नदी तू
अनर्थ हो जायेगा
व्यवस्था का अंत हो जायेगा
तेरे लिए मार्ग सुनिश्चित है

नदी चुप चाप बहती चली जाती है
भीतर की नदी उफनती है
हाहाकार करती है
विद्रोह करती है

पर ऊपर की नदी शांत
बहती चली जाती है

नदी के नीचे भी एक नदी बहती है

अतुल जैन

Wednesday, 18 June 2014

मनोदशा

अकेला हूँ
अकेलेपन का एहसास है

मुझे पता है
न कोई मेरे पास है

सिर्फ दर्द का दरिया है
और यादो का आसमान है

न जाने क्यूँ फिर भी मन मे

उम्मीदों की जमीन है
और ख्वाहिशों का तूफ़ान है

अतुल जैन

Friday, 13 June 2014

बड़े शहर की जिंदगी

थक कर चूर हूँ
फिर भी मजबूर हूँ
उठकर तैयार हूँ
एक नई तलवार हूँ

दौड़ का हिस्सा हूँ
मंजिलो का किस्सा हूँ
किस्तों का जाल हूँ
खुद मे ही सवाल हूँ.

अतुल जैन

जब होगी एक नई सुबह

जब होगी एक नई सुबह,
मुस्कराएगा हर एक उदास चेहरा
उमड़ उठेगा सपनो का सागर
इस हकीकत की दुनिया मे
उठ जायेगा हर एक हारा हुआ हाथ
एक नई शक्ति के साथ
जब होगी एक नई सुबह,
मुस्कराएगा हर एक उदास चेहरा
आँखों मे होगी नए विश्वास की तेज चमक
मन का पंछी दूर, ऊँचे आसमान में उड़ने के लिए बेताब होगा
पीछे छूट चुका होगा वो समय
जब हर चीज़ थी पता नहीं क्यों बेचैन
ऊब चुके थे मन निराशाओं के थपेड़ो से
जब होगी एक नई सुबह,
मुस्कराएगा हर एक उदास चेहरा

“ इंतजार है हमें उसी एक नई सुबह का “


अतुल जैन

लिखनी है एक नई कविता

अपने विचारो के पंख लगाकर
सपनो के आसमान मे उड़ना
एक अच्छा अनुभव है
परन्तु अपने कर्मो की स्याही से
लिखनी हैं भविष्य के खुले आसमान में
एक नयी कविता
जिसका सृजन तो अब होगा
परन्तु उसका अर्थ एवम समझ
अभी भविष्य के पर्दों के पीछे है
परदे एक एक करके हटेंगे
और नयी कहानियों से सामना होगा
लेकिन अभी कविता लिख देने से
वो कहानिया इसी कविता का अंश होंगी
अतः कविता अभी ही लिखनी है
सपनो की नहीं
कर्मो की स्याही से.

अतुल जैन

जीवन चक्र

ऊँची उड़ान
बनी पहचान
फिर ढलान
छूटी कमान
छोड़ा सिर्फ निशान.

शुभ समय,        
अतुल जैन

Thursday, 12 June 2014

मेरी बिटिया

अदृश्य, अद्भभूत, अकल्पनीय "अनुभूति"
क्यूँ कि मिली हैं मुझको,
आकर्षक, अनमोल, अतुलनीय "विभूति"


अतुल जैन

Wednesday, 11 June 2014

मेरी रचनाएँ

मुझे खुशी है कि मिला है समय आपको,
शायद इसीलिए कह सकूँगा खुलकर मैं अपनी बात को,
मेरी रचनाएँ मेरे विचारों का प्रतिबिम्ब हैं,
जो मेरे दिल  एवम् मन की भावनाओ, शंकाओ, दशाओ और अवस्थाओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगी.
ये रचनाएँ मेरे हृदय से लिखी गयीं हैं, आशा हैं ये आपके हृदय को छू लेंगी.
वो रचना एवम् रचनाएँ जो आपके दिल तक जाएँगी,

शायद वही होंगी मेरी सफल कृति.

शुभ समय,        
अतुल जैन