Thursday, 19 June 2014

अंतर द्वन्द

नदी के नीचे भी एक नदी बहती है

पत्थर से टकरा टकरा कर
अकस्मात् नीचे की ओर
उतर आती है नदी

किनारे से हिलकोरे लेती हुई
फैलने की चाह मे कभी कभी
किनारे से लड़ती है नदी
मगर किनारा कहता है

मत फैल नदी तू
अनर्थ हो जायेगा
व्यवस्था का अंत हो जायेगा
तेरे लिए मार्ग सुनिश्चित है

नदी चुप चाप बहती चली जाती है
भीतर की नदी उफनती है
हाहाकार करती है
विद्रोह करती है

पर ऊपर की नदी शांत
बहती चली जाती है

नदी के नीचे भी एक नदी बहती है

अतुल जैन

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