नदी के नीचे भी एक नदी बहती है
पत्थर से टकरा टकरा कर
अकस्मात् नीचे की ओर
उतर आती है नदी
किनारे से हिलकोरे लेती हुई
फैलने की चाह मे कभी कभी
किनारे से लड़ती है नदी
मगर किनारा कहता है
मत फैल नदी तू
अनर्थ हो जायेगा
व्यवस्था का अंत हो जायेगा
तेरे लिए मार्ग सुनिश्चित है
नदी चुप चाप बहती चली जाती है
भीतर की नदी उफनती है
हाहाकार करती है
विद्रोह करती है
पर ऊपर की नदी शांत
बहती चली जाती है
नदी के नीचे भी एक नदी बहती है
अतुल जैन
पत्थर से टकरा टकरा कर
अकस्मात् नीचे की ओर
उतर आती है नदी
किनारे से हिलकोरे लेती हुई
फैलने की चाह मे कभी कभी
किनारे से लड़ती है नदी
मगर किनारा कहता है
मत फैल नदी तू
अनर्थ हो जायेगा
व्यवस्था का अंत हो जायेगा
तेरे लिए मार्ग सुनिश्चित है
नदी चुप चाप बहती चली जाती है
भीतर की नदी उफनती है
हाहाकार करती है
विद्रोह करती है
पर ऊपर की नदी शांत
बहती चली जाती है
नदी के नीचे भी एक नदी बहती है
अतुल जैन
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